वृंदाविपिन निमित्त गहि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (17)

वृंदाविपिन निमित्त गहि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (17)

(कुंडलियाँ)
वृंदाविपिन निमित्त गहि, तिथि बिधि मानैं आन ।
भजन तहाँ कैसे रहै, खोयौ अपनै पान ॥ [1]
खोयौ अपनै पान, मूढ़ कछु समुझत नाहीं ।
चंद्रमनिहिं लै गुहै, काँच के मनियनि माहीं ॥ [2]
जमुना-पुलिन निकुंज-घन, अद्भुत है सुख कौ सदन ।
खेलत लाड़िली-लाल जहँ, ऐसौ है वृंदाविपिन ॥ [3]

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलियां (17)

यदि कोई अल्पज्ञ नित्य विहारमय श्री वृन्दावन के दिव्य स्वरूप को न पहचान कर उसे निमित्त-धर्मों में सम्मिलित करता है अथवा अन्यान्य तिथि विधियों को महत्त्व देता है, तो वह अपने ही हाथों रसमय भजन का तिरस्कार करता है । [1]

सरस भजन रूपी मणि को खोने वाला वह नासमझ इतना बुद्धिहीन है कि चन्द्रकान्त मणि रूपी वृन्दावन को काँच की सामान्य मनिकाओं (तिथि-विधि आदि) के साथ गुंफित कर रहा है । [2]

जो श्री वृन्दावन यमुनातटवर्ती निभृत-निकुंज भवन की अद्धुत प्रेम-क्रीड़ा-सुख का धाम है एवं जहाँ ललित लाड़िली-लाल निरन्तर क्रीड़ा परायण हैं, उसे निमित्त धर्मों में मिलाना बड़ी अज्ञता है । [3]