निन्दा काहू की कबहुँ करै न सोई अनन्य - चाचा वृन्‍दावनदासजी

निन्दा काहू की कबहुँ करै न सोई अनन्य - चाचा वृन्‍दावनदासजी

निन्दा काहू की कबहुँ, करै न सोई अनन्य ।
अपने-अपने इष्ट कौं, भजत जीव ते धन्य ॥

- चाचा वृन्‍दावनदासजी

जो जीव कभी किसी की निंदा नहीं करता एवं अपने इष्ट का ही भजन करता है वही जीव धन्य है एवं अनन्य भक्त कहलाता है।