ब्रजनागरि चूड़ामनि सुख सागर रस रास ।
राखौ निज पद पिंजरे मम मन हंस हुलास ॥ [1]
मम मन हंस हुलास बढ़े दिन दिन अतिभारी ।
रहै सदा चित चाक लखै ज्यों चातक वारी ॥ [2]
कामी के मन काम दाम ज्यों रंकहि भावै।
नवल कुंवर पद प्रीति सु ‘अलबेली अलि’ पावै ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (7)
हे ब्रज नागरी, परम चूड़ामणि रानी, सुख सागर एवं रस रास को बरसाने वाली स्वामिनी, श्री राधा ! ऐसी कृपा करो कि मेरे हंस रूपी मन को तुम अपने चरण रूपी पिंजरे में क़ैद करके रखो जिससे मेरा यह मन सदा प्रफुल्लित रहेगा । [1]
जिससे मेरे ह्रदय का उल्लास अनुदिन बढ़ता ही रहेगा एवं एक चातक के समान तुम्हारे चरण चिन्हों को निहारा करेगा । [2]
जिस प्रकार घोर कामी व्यक्ति को काम प्रिय होता है, एवं रंक को धन प्रिय है, हे नवल किशोरी राधिका, ऐसी कृपा करो कि मुझे आपके चरण कमल में प्रीति भी उसी प्रकार की हो । [3]
राखौ निज पद पिंजरे मम मन हंस हुलास ॥ [1]
मम मन हंस हुलास बढ़े दिन दिन अतिभारी ।
रहै सदा चित चाक लखै ज्यों चातक वारी ॥ [2]
कामी के मन काम दाम ज्यों रंकहि भावै।
नवल कुंवर पद प्रीति सु ‘अलबेली अलि’ पावै ॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (7)
हे ब्रज नागरी, परम चूड़ामणि रानी, सुख सागर एवं रस रास को बरसाने वाली स्वामिनी, श्री राधा ! ऐसी कृपा करो कि मेरे हंस रूपी मन को तुम अपने चरण रूपी पिंजरे में क़ैद करके रखो जिससे मेरा यह मन सदा प्रफुल्लित रहेगा । [1]
जिससे मेरे ह्रदय का उल्लास अनुदिन बढ़ता ही रहेगा एवं एक चातक के समान तुम्हारे चरण चिन्हों को निहारा करेगा । [2]
जिस प्रकार घोर कामी व्यक्ति को काम प्रिय होता है, एवं रंक को धन प्रिय है, हे नवल किशोरी राधिका, ऐसी कृपा करो कि मुझे आपके चरण कमल में प्रीति भी उसी प्रकार की हो । [3]

