दोऊ मिलि एकै भए, ललित रंगीली जोट ।
जमुना-तट निरखौं सदा, तरु बेलिनि की ओट ॥
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (73)
श्रीराधा-कृष्ण की यह दिव्य रसीली जोड़ी प्रेम के अतिरेक में मिलकर पूर्णतः एक हो गई है। मेरी यही एकमात्र अभिलाषा है कि यमुना के पावन तट पर, सघन कुंजों और लताओं की ओट में विहार करती इस जुगल छवि का मैं सदैव दर्शन करता रहूँ।
जमुना-तट निरखौं सदा, तरु बेलिनि की ओट ॥
- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, प्रिया प्रसाद (73)
श्रीराधा-कृष्ण की यह दिव्य रसीली जोड़ी प्रेम के अतिरेक में मिलकर पूर्णतः एक हो गई है। मेरी यही एकमात्र अभिलाषा है कि यमुना के पावन तट पर, सघन कुंजों और लताओं की ओट में विहार करती इस जुगल छवि का मैं सदैव दर्शन करता रहूँ।

