राखो जी लाज गरीब निवाज  - श्री चरण दास, भक्ति सागर

राखो जी लाज गरीब निवाज - श्री चरण दास, भक्ति सागर

राखो जी लाज गरीब निवाज ।
तुम बिन हमरे कौन सँवारै, सबहीं बिगरैं काज ॥ [1]
भक्तबछल हरि नाम कहावो, पतित उधारनहार ।
करो मनोरथ पूरन जन को, सीतल दृष्टि निहार ॥ [2]
तुम जहाज मैं काग तिहारो, तुम तजि अनत न जाऊँ ।
जो तुम हरि जू मारि निकासो, और ठौर नहिं पाऊँ ॥ [3]
चरनदास प्रभु सरन तिहारी, जानत सब संसार ।
मेरी हँसी सो हँसी तुम्हारी, तुम हूँ देखु बिचार ॥ [4]

- श्री चरणदास, भक्ति सागर

हे गरीब निवाज़, मेरी लाज अब तुम्हारे हाथ ही है । तुम्हारे अतिरिक्त ऐसा कौन है जो मेरे बिगड़े काज़ को बना सकता है ? [1]

हे श्री हरि, तुम भक्तवत्सल एवं पतितों का उद्धार करने वाले हो । अपने इस जन पर अपनी शीतल दृष्टि डाल उसकी ह्रदय की इच्छा को पूर्ण करो । [2]

तुम मेरे जहाज हो, और मैं तुम्हारा एक कौआ हूं; तुम्हें छोड़कर, मेरी कोई और ठौर नहीं है। हे प्रभु, यदि तुम मुझे मार कर निकाल दोगे तो मैं अन्य कहाँ जाऊँगा ?  [3]

हे प्रभु, सारा संसार जानता है कि चरणदास आपकी शरण में है। इस बारे में विचार कीजिए कि यदि यह संसार मेरी खिल्ली उड़ाएगा तो उसमें आपका भी तो अपमान ही होगा क्योंकि मेरा संबंध तो आपसे ही है । [4]