आदौत्वमेवासि तथावसाने मध्ये स्वलीलांत्रितयं विभर्षि ।
स्वभावचिच्छक्ति विजृम्भितं यद्राधेत्वदन्यत्र भवेत् कथंचित् ॥
- श्री वंशी अलि, श्री राधा स्तोत्र (2)
हे श्री राधा! जगत की सृष्टि के आदि में तुम ही थीं, मध्य में तीन प्रकार से - विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र बनकर सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार आदि तीन प्रकार से संचालन करती हो और प्रलय के उपरांत भी तुम्हीं शेष रहती हो ।
स्वभावचिच्छक्ति विजृम्भितं यद्राधेत्वदन्यत्र भवेत् कथंचित् ॥
- श्री वंशी अलि, श्री राधा स्तोत्र (2)
हे श्री राधा! जगत की सृष्टि के आदि में तुम ही थीं, मध्य में तीन प्रकार से - विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र बनकर सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार आदि तीन प्रकार से संचालन करती हो और प्रलय के उपरांत भी तुम्हीं शेष रहती हो ।

