राधाकीर्ति कीर्त्तयन् पादरेणुं श्रीराधाया - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.50)

राधाकीर्ति कीर्त्तयन् पादरेणुं श्रीराधाया - श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.50)

राधाकीर्ति कीर्त्तयन् पादरेणुं श्रीराधायाः संस्पृशन् सर्वगात्रैः ।
राधारण्ये पर्यटन् व्याहरञ्च श्रीराधे राधे कालमेतं नयेयम् ॥

- श्री वागीश शास्त्री जी, श्री राधासप्तशती (5.50)

श्रीराधा का यशोगान करते हुए कीर्तन, अपने सम्पूर्ण अंगों द्वारा श्रीराधा की चरण-रेणु का स्पर्श, श्रीराधा के विहार स्थली श्रीवृन्दावन में पर्यटन तथा 'श्रीराधे! राधे!' नाम का उच्चारण करता हुआ, इस जीवन काल को व्यतीत करूँ (यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी साधना है) ।