(राग केदारौ)
राधिका रवन की मुरलिका श्रवन सुनि,
भवन सब काज तजि गवन कियो भामिनी। [1]
नाद बस बिबस भई आन गति छूटि गई,
बिपिन आतुर मिली रूप अभिरामिनी॥ [2]
निकट पिय कें गई रसिक वर गहि लई,
गिरिधरन स्याम घन जुवति सौदामिनी। [3]
करहि बासर केलि कंठ भुज वर मेलि,
चतुर संग 'चतुर्भुजदास' की स्वामिनी॥ [4]
- श्री चतुर्भुज दास
जब श्री राधिका ने श्री कृष्ण की मुरली सुनी तो अपने भवन से समस्त काज को त्याग कर वे वन की ओर चल पड़ी। [1]
मुरली की धुन के रस विवश होकर, अन्य सब कुछ भूलकर, वृंदाविपिन में श्री कृष्ण चन्द्र से आतुर होकर रूप अभिरामिणी श्री राधा, आ मिली। [2]
जब वे श्री कृष्ण के निकट गई तो श्री कृष्ण से ऐसे मिली जैसे घन और दामिनी का संगम होता है। [3]
श्री चतुर्भुज दास की स्वामिनी श्री राधा, श्री कृष्ण चन्द्र के संग कंठ से भुजाओं को मिलकर, केली परायण हो गई। [4]
राधिका रवन की मुरलिका श्रवन सुनि,
भवन सब काज तजि गवन कियो भामिनी। [1]
नाद बस बिबस भई आन गति छूटि गई,
बिपिन आतुर मिली रूप अभिरामिनी॥ [2]
निकट पिय कें गई रसिक वर गहि लई,
गिरिधरन स्याम घन जुवति सौदामिनी। [3]
करहि बासर केलि कंठ भुज वर मेलि,
चतुर संग 'चतुर्भुजदास' की स्वामिनी॥ [4]
- श्री चतुर्भुज दास
जब श्री राधिका ने श्री कृष्ण की मुरली सुनी तो अपने भवन से समस्त काज को त्याग कर वे वन की ओर चल पड़ी। [1]
मुरली की धुन के रस विवश होकर, अन्य सब कुछ भूलकर, वृंदाविपिन में श्री कृष्ण चन्द्र से आतुर होकर रूप अभिरामिणी श्री राधा, आ मिली। [2]
जब वे श्री कृष्ण के निकट गई तो श्री कृष्ण से ऐसे मिली जैसे घन और दामिनी का संगम होता है। [3]
श्री चतुर्भुज दास की स्वामिनी श्री राधा, श्री कृष्ण चन्द्र के संग कंठ से भुजाओं को मिलकर, केली परायण हो गई। [4]

