चाहे सुमेर ते छार करै अरु छार ते चाहे सुमेर बनावै - श्री देव जी

चाहे सुमेर ते छार करै अरु छार ते चाहे सुमेर बनावै - श्री देव जी

(सवैया)
चाहे सुमेर ते छार करै,  अरु छार ते चाहे सुमेर बनावै। [1]
चाहे तो रंक ते राव करै,  अरु राव कौं द्वारहि द्वार फिरावै॥ [2]
रीति यही करुणानिधि की, कवि ‘देव’ कहै विनती मोंहि भावै। [3]
चीटी के पाँव में बाँधि गयंदहि , चाहै समुद्र के पार लगावै॥ [4]

- श्री देव जी

भगवान चाहें तो सुमेरु पर्वत को राख कर दें और राख से सुमेरु बना दें। [1]

चाहे तो भिखारी को राजा बना दे, या फिर राजा को द्वार-द्वार भटकाकर भिखारी बना दे। [2]

यही उस करुणानिधि श्री कृष्ण की रीति है। श्री देव जी कहते हैं कि अतः हमें उसी भगवान से ही केवल विनती करना भाता है। [3]

वे तो ऐसे करुणा-निधान हैं कि चींटी के पाँव में हाथी को बाँधकर, उस चींटी को भी समुद्र पार करवा दें। [4]