सुख रासि हमारी प्यारी जू ।
अति आनन्द भरी रस माती, रोम रोम हितकारी जू ॥ [1]
छिन छिन प्रीति नई नई उपजति, जीवनि जीय जियारी जू ।
श्री ललितकिसोरी के हित विहरत, छिन हूँ होत न न्यारी जू ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (15)
हमारी प्यारी जू [श्री राधा] सुख की राशि हैं । वे प्रगाढ़ आनंद से सदा भरी रहती हैं, रस में उन्मत्त होकर, रोम रोम से प्रेम बरसाती हैं । [1]
उनकी प्रीति छिन छिन नित्य नवीन होती है जो हमारे चित्त को सदा रसासक्त रखकर, नित्य नया जीवन प्रदान करती हैं । श्री ललित किशोरी देव जी कहती हैं कि श्री राधा प्यारी तो नित्य विहार हमारे सुख के लिए ही करती हैं जो हमसे एक क्षण को भी कभी विलग नहीं होती । [2]
अति आनन्द भरी रस माती, रोम रोम हितकारी जू ॥ [1]
छिन छिन प्रीति नई नई उपजति, जीवनि जीय जियारी जू ।
श्री ललितकिसोरी के हित विहरत, छिन हूँ होत न न्यारी जू ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (15)
हमारी प्यारी जू [श्री राधा] सुख की राशि हैं । वे प्रगाढ़ आनंद से सदा भरी रहती हैं, रस में उन्मत्त होकर, रोम रोम से प्रेम बरसाती हैं । [1]
उनकी प्रीति छिन छिन नित्य नवीन होती है जो हमारे चित्त को सदा रसासक्त रखकर, नित्य नया जीवन प्रदान करती हैं । श्री ललित किशोरी देव जी कहती हैं कि श्री राधा प्यारी तो नित्य विहार हमारे सुख के लिए ही करती हैं जो हमसे एक क्षण को भी कभी विलग नहीं होती । [2]

