यत्र वृन्दावने पुण्ये - नारदपुराण, उत्तरार्धः (80.82)

यत्र वृन्दावने पुण्ये - नारदपुराण, उत्तरार्धः (80.82)

यत्र वृन्दावने पुण्ये नरनारीप्लवंगमाः ।
कृमिकीटपतंगाद्याः खगा वृक्षा नगा मृगा:।
समुच्चरंति सतत राधाकृष्णेति मोहिनि ॥

- नारद पुराण, उत्तरार्ध (80.82)

परम पावन श्रीवृन्दावन-धाम के नर-नारी, वानर, कृमि, कीट-पतंग, खग (पक्षी), मृग (पशु), वृक्ष और पर्वत भी निरन्तर श्रीराधा-कृष्ण नाम का उच्चारण (संकीर्तन) करते रहते हैं ।