अब हम प्रिया कृपा धन पायो - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (116)

अब हम प्रिया कृपा धन पायो - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (116)

(राग हमीर, त्रिताल)
अब हम प्रिया कृपा धन पायो ।
श्रीवृन्दावन घूमंत डोलूँ, कहौ काह नहीं पायो ॥ [1]
दासी निज महलन की कीनी, हरषि-हरष जस गायो ।
ललित हरी गोपाल प्रिया सों, अब तो नेह लगायो ॥ [2]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (116)

अब मुझे श्री राधा की अमूल्य कृपा धाम प्राप्त हुआ है । श्री वृंदावन धाम में अब मैं, प्रेम में उन्मत्त सा होकर, घूमता हूँ । अब ऐसा क्या शेष पाना बचा है ? [1]

श्री राधिका ने मुझे अपने निज महल की दासी बना लिया है, अब मैं हर्षोन्माद पूर्वक श्री राधिका का यशोगान करता हूँ । श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि हरि प्रिया अर्थात् श्री राधा से अब मैंने नेह लगाया है । [2]