आरोहन अवरोहनी करत रहैं दिन रैन ।
भगवत रसिक अनन्य के धनि धनि दोऊ नैन ॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (125)
श्रीराधा-कृष्ण अहर्निश प्रेम के रसमय आरोहण-अवरोहण अर्थात प्रेम की गंभीर क्रीड़ा में मग्न रहते हैं। श्री भगवतरसिक जी कहते हैं कि उन अनन्य रसिकों के नेत्र धन्य हैं, जो इस रसमयी युगल छवि को छोड़कर अन्यत्र कहीं और दृष्टिपात भी नहीं करते।
भगवत रसिक अनन्य के धनि धनि दोऊ नैन ॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (125)
श्रीराधा-कृष्ण अहर्निश प्रेम के रसमय आरोहण-अवरोहण अर्थात प्रेम की गंभीर क्रीड़ा में मग्न रहते हैं। श्री भगवतरसिक जी कहते हैं कि उन अनन्य रसिकों के नेत्र धन्य हैं, जो इस रसमयी युगल छवि को छोड़कर अन्यत्र कहीं और दृष्टिपात भी नहीं करते।

