राधे रानी ! तुम को मेरी लाज - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (109)

राधे रानी ! तुम को मेरी लाज - श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (109)

(राग जंगला व कान्हरा)
राधे रानी ! तुम को मेरी लाज ।
तुम बिन और कछु नहिं भावे, हे श्यामा ! सुख साज ॥ [1]
तुमरो नाम रटूँ निशिवासर, और नहीं कछु काज ।
चरण कमल तज अनत न जावे, यह मेरो चित भाज ॥ [2]
तुमरो सुयश निरन्तर गाऊँ, हिल मिल रसिक समाज ।
‘रूपमाधुरी’ किरपा करके, विनय सुनहुँ प्रिये आज ॥ [3]

- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (109)

हे राधारानी मेरी लाज तो आपके हाथ है । हे सुख स्वरूपा श्यामा जू! तुम्हारे अतिरिक्त मुझे और कोई नहीं भाता ! [1]

दिन रात तुम्हारे नाम के रटन के अतिरिक्त मेरा अन्य कोई काम नहीं । ऐसी कृपा बनाये रखना कि मेरा मन तुम्हारे चरणों के अतिरिक्त कहीं और न भाग कर जाए । [2]

ऐसी कृपा बनी रहे कि रसिक समाज के संग मैं तुम्हारा प्रेमपूर्वक यशोगान करता रहूँ  । श्री रूप माधुरी जी कहते हैं कि हे प्यारी जू, कृपा करके मेरी विनती को आज आकर सुनो । [3]