तीर्थ सबै देखे सुने, कोउ नहिं या तूल ।
ब्रज अवनी रगमगी रही, कृष्ण चरन अनुकूल ॥
- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (4)
तीर्थ तो बहुत देखे एवं सुने हैं परंतु इस ब्रज भूमि के समान कोई नहीं है जहाँ की रज आज भी श्रीकृष्ण के श्रीचरणों के स्पर्श और उनके अलौकिक अनुराग से ओतप्रोत है।
ब्रज अवनी रगमगी रही, कृष्ण चरन अनुकूल ॥
- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (4)
तीर्थ तो बहुत देखे एवं सुने हैं परंतु इस ब्रज भूमि के समान कोई नहीं है जहाँ की रज आज भी श्रीकृष्ण के श्रीचरणों के स्पर्श और उनके अलौकिक अनुराग से ओतप्रोत है।

