बोलौ बन राधे सुखरासी - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (69)

बोलौ बन राधे सुखरासी - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (69)

(राग भैरवी)
बोलौ बन राधे सुखरासी ।
मेरे औगुन कितक लाडिली, तुम अपार करुना की रासी ॥ [1]
ललितकिशोरी तजौ न मोकों, चहूँ ओर ह्वैहै तुव हांसी ।
ह्वै दासी तोरी श्रीस्वामिनि, होत नहीं अब आन खवासी ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (69)

हे सुख राशि लाड़ली [श्री राधे], आप ही बताओ, मेरे अवगुण तो कितने होंगे, परंतु आप तो अपार करुणा की समुद्र हो, अत: आप मेरे अवगुणों को न विचारते हुए मुझ पर अपनी कृपा बरसाइये ।  [1]

श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि स्वामिनी जू, मैंने तो आपकी शरण ली है, यदि अब आपने मुझे त्याग दिया तो जग में चारों ओर आपकी हाँसी होगी (लोग मज़ाक़ बनायेंगे)। मैं तो आपकी ही अनन्य दासी हूँ स्वामिनी, अब आपके अतिरिक्त अन्य किसी की दासता (भक्ति) मेरे से नहीं होने वाली । [2]