राधा दास्य रसाभिलाषसहितं - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (28)

राधा दास्य रसाभिलाषसहितं - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (28)

राधादास्यरसाभिलाषसहितं चेन्मानसं मानवास्तर्हि श्रीवृषभानुजासरसिका वासं कुरुध्वं न किम ।
स्नेहेनात्रकलेवरे पदवरे युष्माभिरायाति ते श्रीवन्दाविपिनेश्वरी सुकरुणा पूर्ण ध्रुवं भाविनी ॥

- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (28)

हे मानवगण ! यदि श्री राधा दास्य रस में अभिषिक्त होने के लिये मन में इच्छा है तो श्रीवृषभानु नन्दिनी की सरसी में क्यों नहीं वास करते हो । यदि राधाकुंड में प्रीति के साथ वास कर सकते तो अवश्य इसी शरीर में श्री राधिका दर्शन देंगी तथा भविष्य में उनकी पूर्ण करुणा होगी ।