मेरी मति राधिका चरन रज में रहौ - गोस्वामी श्री हरिराय जी

मेरी मति राधिका चरन रज में रहौ - गोस्वामी श्री हरिराय जी

(राग रामकली)
मेरी मति राधिका चरन रज में रहौ ।
इहै निस्चै करो, पुने मन में धरौ,
भूलिकै कोऊ कछू और हु फल छहौ ॥ [1]
करम कोऊ करौ, ज्ञान हू अनुसरौ,
मुक्ति के जतन करि, बृथा देही दहौ ।
‘रसिक' बल्लभ चरन, कमल जुग परि सरन,
आस धरि यह महा, पुष्टि पथ फल लहौ ॥ [2]

- गोस्वामी श्री हरिराय जी

ऐसी कृपा हो कि मेरी मति श्री राधिका चरण रज में सदा बनी रहे (अर्थात् उनके चरणों की रज में मेरी पूर्ण शरणागति रहे ) । मैं अपने मन को दृढ़ता पूर्वक, बार बार निश्चय करवाता हूँ कि श्री राधिका चरणों में ही पूर्ण आस्था रखकर, अन्य किसी फल की भूल कर भी चाह नहीं करनी है । [1]

चाहे कोई कर्म, एवं ज्ञान का अनुसरण करे, कोई मुक्ति आदि यतन कर व्यथा ही परिश्रम करे परंतु मुझे तो अनन्य भाव से श्री राधिका की चरण रज की ही भक्ति करनी है । गोस्वामी श्री हरिराय जी कहते हैं कि श्री राधिका एवं वल्लभ के जुगल चरण कमलों का अनन्य आश्रय प्राप्त करना ही पुष्टिमार्ग में चलने का अंतिम फल है । [2]