प्रियालाल देखि मन फूले -  श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (3)

प्रियालाल देखि मन फूले - श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (3)

प्रियालाल देखि मन फूले ।
देखि देखि लालन सुख पावै, रूप रंग रस झूले ॥ [1]
प्रिया लाल के तन लपटानी, प्रिय की कृपा अतूले ।
चतुरसखी या छवि कूँ निरखत, तन मन को सुधि भूले ॥ [2]

- श्री चतुर दास जी, श्री चतुर दास जी की वाणी, रस के पद (3)

लाल (श्री कृष्ण) प्रियाजू (श्री राधा) को देखकर फूले नहीं समा रहे हैं । वे उन्हें बार-बार देख कर आनन्दित हो रहे हैं और उनके रूप रसासव का पान कर अद्भुत सुख सिंधु में हिलोरें ले रहे हैं । [1]

लाल को इस प्रकार आनंदित देख प्रियाजी स्वत: उनके श्री अंगों से लिपट जाती हैं । श्री लाड़ली जू की कृपा की कहीं कोई तुलना नहीं । चतुर सखी इस छवि को निरख अपने तन मन की सुधि ही भूल गई । [2]