(राग मल्हार)
नन्दनन्दन बन बंशी बजाई री ।
श्रवण करत सुधि रही न तन की, एक संग मो मति बौराई री ॥ [1]
नयन चकोर चहत निरखन कों, शरद चन्दमुख कुँवर कन्हाई री ।
नारायण नहिं भवन सुहावत, कहा करूँ अब एरी माई री ॥ [2]
श्रवण करत सुधि रही न तन की, एक संग मो मति बौराई री ॥ [1]
नयन चकोर चहत निरखन कों, शरद चन्दमुख कुँवर कन्हाई री ।
नारायण नहिं भवन सुहावत, कहा करूँ अब एरी माई री ॥ [2]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वंशी लीला (4)
एक सखी कहती है कि नंदनंदन श्री कृष्ण ने वन में वंशी बजाई जिसका श्रवण कर तन की सुधि नहीं रही और एक ही क्षण में मति बौरा गई । [1]
श्री कृष्ण का मुख शरद रात्रि के चन्द्र के समान है जिसके दर्शन करने के लिए यह चकोर के समान नयन प्यासे हो उठे । श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि हे सखी अब मैं क्या करूँ क्योंकि अब तो घर परिवार सुहाता ही नहीं । [2]
श्री कृष्ण का मुख शरद रात्रि के चन्द्र के समान है जिसके दर्शन करने के लिए यह चकोर के समान नयन प्यासे हो उठे । श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि हे सखी अब मैं क्या करूँ क्योंकि अब तो घर परिवार सुहाता ही नहीं । [2]

