रसिकन सों ऐंठे फिरें बिमुखति भेंटत धाइ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (35)

रसिकन सों ऐंठे फिरें बिमुखति भेंटत धाइ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (35)

रसिकन सों ऐंठे फिरें, बिमुखति भेंटत धाइ ।
ऊँट कपूर न सूँघई, टेढ़े काँटे खाइ ॥

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (35)

कुछ लोग ऐसे स्वभाव के होते हैं जो रसिक उपासकों से तो सदाकाल अपनी अकड़ में भरकर रहते हैं और विमुखों (सांसारिक जीवों) से बड़े प्रेमपूर्वक मिलते हैं, उनको ऐसा जानना चाहिए कि ऊँट टेढ़े काँटों को तो स्वाद लेकर खाता है और कपूर को सूँघना ही नहीं जानता।