प्रनऊं वे श्री रसिक अनन्य ।
जिनके जुगल किशोर हृदै में, सुपन न कवहूँ आवति अन्य ॥ [1]
वसत निरंतर तजति न पल छिन, प्रान सजीवन वृन्दारण्य ।
गावति सुनत चरित्रनि मोहन, मानत सुख यों रूप अभिन्न ॥ [2]
- श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (4)
उन अनन्य रसिकों को मेरा प्रणाम है जिनके ह्रदय में स्वप्न में भी युगल सरकार श्री राधा कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं बसा हुआ है । [1]
वे श्री वृंदावन धाम को ही अपना प्राणों का धन मानकर यहीं निरंतर वास करते हैं एवं एक क्षण को भी श्री वृंदावन धाम का परित्याग नहीं करते । वे मनोहर चरित्रों को गाते एवं सुनते हैं एवं वृंदावन को श्री प्रिया प्रियतम का ही अभिन्न रूप मानते हैं । [2]
जिनके जुगल किशोर हृदै में, सुपन न कवहूँ आवति अन्य ॥ [1]
वसत निरंतर तजति न पल छिन, प्रान सजीवन वृन्दारण्य ।
गावति सुनत चरित्रनि मोहन, मानत सुख यों रूप अभिन्न ॥ [2]
- श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (4)
उन अनन्य रसिकों को मेरा प्रणाम है जिनके ह्रदय में स्वप्न में भी युगल सरकार श्री राधा कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं बसा हुआ है । [1]
वे श्री वृंदावन धाम को ही अपना प्राणों का धन मानकर यहीं निरंतर वास करते हैं एवं एक क्षण को भी श्री वृंदावन धाम का परित्याग नहीं करते । वे मनोहर चरित्रों को गाते एवं सुनते हैं एवं वृंदावन को श्री प्रिया प्रियतम का ही अभिन्न रूप मानते हैं । [2]

