लंपट क्रूर कुढंग हौं, कपटी कुटिल कठोर ।
जन सुख साधा राधिका, हरिये कंटक मोर ॥
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद
हे करुणामयी श्रीराधे! यद्यपि मैं आचरणहीन, कुटिल, कठोर और कपटी हूँ, तथापि आप अपने शरणागतों के मनोरथ सिद्ध करने वाली हैं। मुझ जैसे दीन पर कृपा कीजिए और मेरे हृदय की मायाजनित वासनाओं तथा समस्त द्वंद्वों का समूल नाश कर दीजिए।
जन सुख साधा राधिका, हरिये कंटक मोर ॥
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद
हे करुणामयी श्रीराधे! यद्यपि मैं आचरणहीन, कुटिल, कठोर और कपटी हूँ, तथापि आप अपने शरणागतों के मनोरथ सिद्ध करने वाली हैं। मुझ जैसे दीन पर कृपा कीजिए और मेरे हृदय की मायाजनित वासनाओं तथा समस्त द्वंद्वों का समूल नाश कर दीजिए।

