(राग धनाश्री)
मैं कैसें रस रासहिं गाऊँ ।
श्री राधिका स्याम की प्यारी, कृपा बास ब्रज पाऊँ ॥ [1]
आन देव सपनैंहू न जानौ, दंपति कौं सिर नाऊँ ।
भजन-प्रताप, चरन-महिमा तैं गुरु की कृपा दिखाऊँ ॥ [2]
नव निकुंज बन धाम-निकट इक, आनँद-कुटी रचाऊँ ।
सूर कहा बिनती करि बिनवै, जनम-जनम यह ध्याऊँ ॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर
मैं किस प्रकार रास रस का वर्णन करूँ ? श्यामसुन्दर की प्यारी श्रीराधिका जू की कृपा से ही केवल मैं ब्रज का वास प्राप्त कर सकता हूँ! [1]
मैं किसी अन्य देवता को एक क्षण के लिए भी नहीं जानता, केवल दिव्य दंपति श्री राधा कृष्ण के आगे ही अपना सिर झुकाता हूँ! अपने भजनों में उनकी महिमा को अपने गुरु की कृपा एवं चरणों के बल से ही प्रकट कर सकता हूँ! [2]
ऐसी कृपा हो कि मैं प्रिया प्रियतम के नव निकुंज में श्री धाम के निकट ही एक आनंद कुटिया रचाऊँ । श्री सूरदास कहते हैं, "मैं जन्म-जन्मान्तर केवल श्री राधा कृष्ण का चिंतन करता रहूँ, इसके अतिरिक्त और क्या याचना करूँ?" [3]
मैं कैसें रस रासहिं गाऊँ ।
श्री राधिका स्याम की प्यारी, कृपा बास ब्रज पाऊँ ॥ [1]
आन देव सपनैंहू न जानौ, दंपति कौं सिर नाऊँ ।
भजन-प्रताप, चरन-महिमा तैं गुरु की कृपा दिखाऊँ ॥ [2]
नव निकुंज बन धाम-निकट इक, आनँद-कुटी रचाऊँ ।
सूर कहा बिनती करि बिनवै, जनम-जनम यह ध्याऊँ ॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर
मैं किस प्रकार रास रस का वर्णन करूँ ? श्यामसुन्दर की प्यारी श्रीराधिका जू की कृपा से ही केवल मैं ब्रज का वास प्राप्त कर सकता हूँ! [1]
मैं किसी अन्य देवता को एक क्षण के लिए भी नहीं जानता, केवल दिव्य दंपति श्री राधा कृष्ण के आगे ही अपना सिर झुकाता हूँ! अपने भजनों में उनकी महिमा को अपने गुरु की कृपा एवं चरणों के बल से ही प्रकट कर सकता हूँ! [2]
ऐसी कृपा हो कि मैं प्रिया प्रियतम के नव निकुंज में श्री धाम के निकट ही एक आनंद कुटिया रचाऊँ । श्री सूरदास कहते हैं, "मैं जन्म-जन्मान्तर केवल श्री राधा कृष्ण का चिंतन करता रहूँ, इसके अतिरिक्त और क्या याचना करूँ?" [3]

