(सवैया)
शिव शंकर छोड़ दियो डमरू, तजि शारद वीणा को भाजन लागी।
ध्वनि पूरि पताल गई नभ में, ऋषि नारद के शिर गाजन लागी॥ [1]
जड़ जंगम मोहि गये सब ही, यमुना जल रोकि के राजन लागी।
‘हरेकृष्ण’! जवै ब्रज मण्डल में, ब्रजराज की बाँसुरी बाजन लागी॥ [2]
- श्री हरे कृष्ण जी
शिवजी ने अपना डमरू त्याग दिया और सरस्वतीजी अपनी वीणा छोड़कर भाग गईं; इस दिव्य मधुर धुन ने पाताल एवं नभ में ऐसी गूंज कर दी कि ऋषि नारद के सिर पर यह गरजने लगी। [1]
श्री हरे कृष्ण कहते हैं कि जब ब्रज मंडल में ब्रजराज श्री कृष्ण की बांसुरी बजने लगी, तो जड़ और चेतन सभी मोहित हो उठे और यमुना जी का जल ठहर गया। [2]
शिव शंकर छोड़ दियो डमरू, तजि शारद वीणा को भाजन लागी।
ध्वनि पूरि पताल गई नभ में, ऋषि नारद के शिर गाजन लागी॥ [1]
जड़ जंगम मोहि गये सब ही, यमुना जल रोकि के राजन लागी।
‘हरेकृष्ण’! जवै ब्रज मण्डल में, ब्रजराज की बाँसुरी बाजन लागी॥ [2]
- श्री हरे कृष्ण जी
शिवजी ने अपना डमरू त्याग दिया और सरस्वतीजी अपनी वीणा छोड़कर भाग गईं; इस दिव्य मधुर धुन ने पाताल एवं नभ में ऐसी गूंज कर दी कि ऋषि नारद के सिर पर यह गरजने लगी। [1]
श्री हरे कृष्ण कहते हैं कि जब ब्रज मंडल में ब्रजराज श्री कृष्ण की बांसुरी बजने लगी, तो जड़ और चेतन सभी मोहित हो उठे और यमुना जी का जल ठहर गया। [2]

