जैसे मेरे जिय में तू बसत है -  श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (59)

जैसे मेरे जिय में तू बसत है - श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (59)

जैसे मेरे जिय में तू बसत है, ऐसे हों तेरे जिय में बसत हौं कैधौं नाहीं ।
तेरी छवि मेरी अंखिया भरि रही, कछु न सुहाइ मेरौ जीवन तौ ताहीं ॥ [1]
सुनि मेरे प्रानपति प्यारे, तू ही मम जीवन तू ही प्रान-तन माहीं ।
श्रीललितमोहनी कौ सुख बिहरौ, अब जिन करौ बिलंब कहत समुझाहीं ॥ [2]

- श्री ललित मोहिनी देव, ललित मोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (59)

श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं - हे प्यारी जैसे मेरे ह्रदय में आप बसी हैं, वैसे ही मैं आपके ह्रदय में बसा हूँ कि नहीं ?
आपकी छवि तो अहर्निश मेरे नेत्रों में समाई हुई है । मेरा तो जीवन केवल आप हो, आपके अतिरिक्त अन्य मुझे कुछ भी भाता नहीं । [1]

श्री राधा उत्तर देती हैं - हे मेरे प्राण प्यारे, सुनिये ! मेरे लिए भी आप ही मेरे जीवन हो और अंग अंग एवं मन-प्राण में समाये हुए हो । इतने में (इस वार्तालाप के मध्य) श्री ललित मोहिनी जी कहती हैं कि हे प्रिया प्रियतम! अपने एवं सखियों के प्राणों के समान सुख “विहार" में कृपा आप दोनों विलंभ न करो एवं उसका आस्वादन करो । [2]