(राग सारंग, चर्चरी ताल)
नव कुँवर चक्र चूड़ा नृपतिमनि साँवरौ, राधिका तरुणि मनि पट्टरानी।
शेष गृह आदि बैकुंठ पर्यंत सब लोक थानैंत, बन राजधानी ॥ [1]
मेघ छ्यानवै कोटि बाग सींचत जहाँ, मुक्ति चारौं जहाँ भरत पानी ।
सूर, ससि पाहरू, पवन जन, इंदिरा चरण दासी, भाट निगम वानी ॥ [2]
धर्म कुतवाल, शुक सूत, नारद चारु, फिरत चर चार सनकादि ज्ञानी ।
सतोगुन पौरिया, काल वन्दुवा, कर्म डाँडियै, काम रति सुख निसानी ॥ [3]
कनक मरकत धरनि कुंज कुसुमित महल मध्य कमनीय शयनीय ठानी ।
पल न बिछुरत दोऊ, जात नहिं तहाँ कोऊ, व्यास महलनि लियें पीकदानी ॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (46)
श्री वृंदावन धाम प्रेम की राजधानी है जहां के राजा नायक शिरोमणि श्री श्याम सुन्दर और रानी तरुणि-मणि श्री राधिका हैं । पाताल से वैकुंठ तक के सब लोकों का स्वामी यह वृंदावन धाम है । [1]
छयानवै कोटि मेघ वृन्दावन के बागों को सींचते हैं और चारों प्रकार की मुक्ति इस वृंदावन में पानी भरती रहती हैं ।
सूर्य-चन्द्र यहाँ के पहरेदार हैं, पवन खिदमतगार है, इन्दिरा चरणदासी है और निगमवाणी भाट हैं । [2]
धर्म इस धाम का कोतवाल है ओर शुकदेव, सूतजी, नारद एवं सनकादि ज्ञानी चार गुप्तचर हैं ।
सतोगुण द्वार पाल है, काल राज-बन्दी है, कर्म दण्डदाता है और काम-रति सुख वहाँ की ध्वजा है । [3]
यहाँ की धरती कनक और मरकत-मणि से अलंकृत है ओर कुसुमित कुंज-महल में कमनीय सेज की नित्य रचना हो रही है। इस धाम में प्रिया प्रियतम पाल भर के लिए भी बिछुड़ते नहीं, यह स्थान सबके लिये सुलभ भी नहीं है और व्यासदास इस महल में पीकदानी लिये हुए सदैव उपस्थित रहते हैं । [4]
नव कुँवर चक्र चूड़ा नृपतिमनि साँवरौ, राधिका तरुणि मनि पट्टरानी।
शेष गृह आदि बैकुंठ पर्यंत सब लोक थानैंत, बन राजधानी ॥ [1]
मेघ छ्यानवै कोटि बाग सींचत जहाँ, मुक्ति चारौं जहाँ भरत पानी ।
सूर, ससि पाहरू, पवन जन, इंदिरा चरण दासी, भाट निगम वानी ॥ [2]
धर्म कुतवाल, शुक सूत, नारद चारु, फिरत चर चार सनकादि ज्ञानी ।
सतोगुन पौरिया, काल वन्दुवा, कर्म डाँडियै, काम रति सुख निसानी ॥ [3]
कनक मरकत धरनि कुंज कुसुमित महल मध्य कमनीय शयनीय ठानी ।
पल न बिछुरत दोऊ, जात नहिं तहाँ कोऊ, व्यास महलनि लियें पीकदानी ॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (46)
श्री वृंदावन धाम प्रेम की राजधानी है जहां के राजा नायक शिरोमणि श्री श्याम सुन्दर और रानी तरुणि-मणि श्री राधिका हैं । पाताल से वैकुंठ तक के सब लोकों का स्वामी यह वृंदावन धाम है । [1]
छयानवै कोटि मेघ वृन्दावन के बागों को सींचते हैं और चारों प्रकार की मुक्ति इस वृंदावन में पानी भरती रहती हैं ।
सूर्य-चन्द्र यहाँ के पहरेदार हैं, पवन खिदमतगार है, इन्दिरा चरणदासी है और निगमवाणी भाट हैं । [2]
धर्म इस धाम का कोतवाल है ओर शुकदेव, सूतजी, नारद एवं सनकादि ज्ञानी चार गुप्तचर हैं ।
सतोगुण द्वार पाल है, काल राज-बन्दी है, कर्म दण्डदाता है और काम-रति सुख वहाँ की ध्वजा है । [3]
यहाँ की धरती कनक और मरकत-मणि से अलंकृत है ओर कुसुमित कुंज-महल में कमनीय सेज की नित्य रचना हो रही है। इस धाम में प्रिया प्रियतम पाल भर के लिए भी बिछुड़ते नहीं, यह स्थान सबके लिये सुलभ भी नहीं है और व्यासदास इस महल में पीकदानी लिये हुए सदैव उपस्थित रहते हैं । [4]

