ढपें दोष गुन फुट करें, पर हरिजन यह चाल।
लखि शिव दुहु दधि तें लहे, गरल गिल्यो शशिभाल॥
- श्री दयाराम जी
परम वैष्णवों और संतों की यही विलक्षण पद्धति है कि वे दूसरों के दोषों को ढक लेते हैं और केवल गुणों को ही प्रकाशित करते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे महादेव ने क्षीर-सागर के मंथन से प्राप्त हलाहल विष को स्वयं पी लिया, किंतु उज्ज्वल चंद्रमा को अपने मस्तक का आभूषण बनाया।
लखि शिव दुहु दधि तें लहे, गरल गिल्यो शशिभाल॥
- श्री दयाराम जी
परम वैष्णवों और संतों की यही विलक्षण पद्धति है कि वे दूसरों के दोषों को ढक लेते हैं और केवल गुणों को ही प्रकाशित करते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे महादेव ने क्षीर-सागर के मंथन से प्राप्त हलाहल विष को स्वयं पी लिया, किंतु उज्ज्वल चंद्रमा को अपने मस्तक का आभूषण बनाया।

