(राग सारंग)
जमुना कूल कदम की छंहियां गरवहियां दीयै बैठे दोऊजन । [1]
वीन मृदंग वजावत सहचरि गावत सारंग प्रेम मगन मन ॥ [2]
अरस परस रस रंग वढावत विपुल पुलक न समावत हैं तन । [3]
रूपरसिक निरषत हियँ हरषत नैंन न पल लागतरी निमषन ॥ [4]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (32)
श्री वृंदावन धाम में यमुना के किनारे, कदंब वृक्ष की छाया में, दोनों लाड़ली लाल [श्री राधा कृष्ण] गलबहियां दिये बैठे हैं । [1]
प्रेम में उन्मत्त होकर सहचरियाँ वीणा एवं मृदंग बजा रही हैं एवं राग सारंग में सुंदर गान कर, लाड़ली लाल के प्रेम को बढ़ा रही हैं । [2]
लाड़ली लाल एक दूसरे के अंगों का स्पर्श कर रस रंग बढ़ा रहे हैं एवं प्रेम से रोमांचित होकर तन की सुधि भुला रहे हैं । [3]
श्री रूपरसिक देवाचार्य जी इस प्रेम लीला का दर्शन कर ह्रदय में ऐसे प्रफुल्लित हो रहे हैं कि अपलक नेत्रों से लाड़ली लाल को एकटक निहार रहे हैं । [4]
जमुना कूल कदम की छंहियां गरवहियां दीयै बैठे दोऊजन । [1]
वीन मृदंग वजावत सहचरि गावत सारंग प्रेम मगन मन ॥ [2]
अरस परस रस रंग वढावत विपुल पुलक न समावत हैं तन । [3]
रूपरसिक निरषत हियँ हरषत नैंन न पल लागतरी निमषन ॥ [4]
- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (32)
श्री वृंदावन धाम में यमुना के किनारे, कदंब वृक्ष की छाया में, दोनों लाड़ली लाल [श्री राधा कृष्ण] गलबहियां दिये बैठे हैं । [1]
प्रेम में उन्मत्त होकर सहचरियाँ वीणा एवं मृदंग बजा रही हैं एवं राग सारंग में सुंदर गान कर, लाड़ली लाल के प्रेम को बढ़ा रही हैं । [2]
लाड़ली लाल एक दूसरे के अंगों का स्पर्श कर रस रंग बढ़ा रहे हैं एवं प्रेम से रोमांचित होकर तन की सुधि भुला रहे हैं । [3]
श्री रूपरसिक देवाचार्य जी इस प्रेम लीला का दर्शन कर ह्रदय में ऐसे प्रफुल्लित हो रहे हैं कि अपलक नेत्रों से लाड़ली लाल को एकटक निहार रहे हैं । [4]

