लटकि चलत राधा गरबाहीं -  श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (123)

लटकि चलत राधा गरबाहीं - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (123)

गौर-स्याम अभिराम देषे बिनु नाहिन चैन परै ।
हाइ-हाइ कित जाऊँ सखी री हियरैं अगिन बरै ॥ [1]
ज्यौं ज्यौं सुनियत नाम दुहुनि कौ होत है खरै-खरै ।
जैश्री वंशीअलि लोचन तरफत अति यहु दुष कौन भरै ॥ [2]

- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (19)

एक सहचरी दूसरी सहचरी से कहती है - गौर श्यामल वर्ण वाले दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण को देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता । मुझे ऐसी बैचैनी हो जाती है कि मैं सोचती हूँ कहाँ जाऊँ और मेरा ह्रदय उनके वियोग की अग्नि में जलने लगता है । [1]

श्री वंशी अली जी कहते हैं कि जैसे जैसे दोनों का नाम सुनती हूँ और यदि और विलंभ हो रहा हो, तो उनसे मिले बिना मेरी अँखियाँ अत्यधिक तड़पने लगती हैं जिसका दुख असहनीय हो जाता है  । [2]