अति निरपेक्ष संग संग्रह - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, साखी (3)

अति निरपेक्ष संग संग्रह - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, साखी (3)

अति निरपेक्ष संग संग्रह, अनन्य आँन गति नाँहिं ।
श्रीबिहारिनीदासि उपासि सुख, संग पैठि महल मन माँहि ॥

- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जु की वाणी, साखी (3)

सांसारिक आसक्तियों और संग्रह की प्रवृत्ति से सर्वथा विरक्त होकर, जब साधक स्वामी श्रीहरिदास जी द्वारा प्रवर्तित 'नित्य-विहार' रस को ही अपना परम लक्ष्य मान लेता है, तब श्रीबिहारिनी जू (प्रियाजी) की सखी-भाव से सेवा करते हुए उसका मन उस एकान्तिक निकुंज-महल के परम रस-देश में प्रवेश पाने का अधिकारी बनता है।