बार बार रीझि रीझि कहत विहारीलाल - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (287)

बार बार रीझि रीझि कहत विहारीलाल - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (287)

(कवित्त)
बार बार रीझि रीझि कहत विहारीलाल
देखिये निहारी प्रिये शोभा वंशीबट की। [1]
झलकत जल में झलकि नाना भांतिन की
झूमि झूमि डारे सब धरनि सों लटकी॥ [2]
चहुँ ओर नाचत चकोर मोर रस भरे
सारसनि लागी जक तुब नाम रटकी। [3]
इन सौ हितू न मोकूँ कोऊ और लागत है
कहिये कहां लों कौंन जाने मेरे घट की॥ [4]

- श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (287)

श्री कृष्ण, प्रेम में उन्मत्त होकर, बार बार श्री प्रियाजी जी [श्री राधा] से कहते हैं कि हे प्यारी जू! वंशीवट की अद्भुत शोभा को निहारिये! [1]

यमुना के जल में नाना प्रकार की झलक दिखाई दे रही है और वृक्षों की शाखायें एवं टहनियाँ झूम झूम कर ब्रज भूमि से लटकी हुई हैं। [2]

चारों ओर चकोर एवं मोर रस में भरकर नाच गा रहे हैं एवं हंस तो तुम्हारे नाम की अनवरत रटन कर रही है। [3]

श्री कृष्ण कहते हैं कि इनसे अधिक तो मुझे और कोई प्यारा ही नहीं है, मैं कहाँ तक इनका वर्णन करूँ, मेरे ह्रदय की बात को भला कौन जानेगा। [4]