कृपास्य दैन्यादियुजि प्रजायते यया भवेत् प्रेमविशेषलक्षणा ।
भक्तिर्ह्यनन्याधिपतेर्महात्मन:सा चोत्तमा साधनरूपिकाऽपरा ॥
- जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (9)
अनन्याधिपति सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य कृपा दैन्य ह्रदय (दीनता युक्त) प्रपन्न भक्तों पर ही होती है जिसके फल स्वरूप उनमें रसमयी भक्ति प्रकट होती है वही फलरूपा एवं प्रेमलक्षणा उत्तमा भक्ति वर्णित है तथा ये प्रेमलक्षणा परा भक्ति अनन्य भागवतजनों के निर्मल अन्तःकरण में स्फुरित होती है। श्रवण कीर्तन आदि साधन रूपा भक्ति, अपरा भक्ति कहलाती है।
भक्तिर्ह्यनन्याधिपतेर्महात्मन:सा चोत्तमा साधनरूपिकाऽपरा ॥
- जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (9)
अनन्याधिपति सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य कृपा दैन्य ह्रदय (दीनता युक्त) प्रपन्न भक्तों पर ही होती है जिसके फल स्वरूप उनमें रसमयी भक्ति प्रकट होती है वही फलरूपा एवं प्रेमलक्षणा उत्तमा भक्ति वर्णित है तथा ये प्रेमलक्षणा परा भक्ति अनन्य भागवतजनों के निर्मल अन्तःकरण में स्फुरित होती है। श्रवण कीर्तन आदि साधन रूपा भक्ति, अपरा भक्ति कहलाती है।

