जो कोई वृन्दावन रस चाखै ।
खाटी लगे खांड अरु षटरस, आन देश की दाखै ॥ [1]
परयौ रहे कुंजन के कोने, श्याम राधिका भाखै ।
भूख लगे तब पावै भाजी, निरख रहे तरु शाखै ॥ [2]
प्राण समान तजै नहीं सीवां, लोभ दिखावै लाखै ।
‘जन गोविन्द’ बलवीर कृपा सों, जो ब्रजरानी राखै ॥ [3]
- श्री जन गोविंद जी
जिसको श्री वृंदावन के रस का चस्का लग गया हो उसको चीनी एवं आठ प्रकार के रस खट्टे लगने लगते हैं एवं अन्य देशों का विचरण दुखदाई लगता है । [1]
खाटी लगे खांड अरु षटरस, आन देश की दाखै ॥ [1]
परयौ रहे कुंजन के कोने, श्याम राधिका भाखै ।
भूख लगे तब पावै भाजी, निरख रहे तरु शाखै ॥ [2]
प्राण समान तजै नहीं सीवां, लोभ दिखावै लाखै ।
‘जन गोविन्द’ बलवीर कृपा सों, जो ब्रजरानी राखै ॥ [3]
- श्री जन गोविंद जी
जिसको श्री वृंदावन के रस का चस्का लग गया हो उसको चीनी एवं आठ प्रकार के रस खट्टे लगने लगते हैं एवं अन्य देशों का विचरण दुखदाई लगता है । [1]
ऐसा रसिक भक्त तो बस श्री वृंदावन के किसी कुंज के कोने में पड़ा रहकर, श्री राधा कृष्ण का भजन करना चाहता है । यदि उसे भूख लगती है तो सादी सब्ज़ी खा कर, वृंदावन के वृक्षों एवं लताओं में भजन पारायण रहता है । [2]
चाहे उसको लाख प्रलोभन क्यों न दिखाओ, वे प्राणों को तो त्याग कर सकता है, परंतु वृंदावन की सीमा को कदापि त्याग नहीं सकता । श्री जन गोविंद जी कहते हैं कि उन्होंने रसिकों की कृपा से यही जाना है कि जिसको वृंदावन की महारानी श्री राधारानी वृंदावन में स्वयं रखे वही यहाँ रह सकता है ,अन्यथा तो यहाँ कोई प्रवेश तक नहीं पा सकता । [3]

