दुश्चेष्टानां दुर्मतीनांच कोटि - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.48)

दुश्चेष्टानां दुर्मतीनांच कोटि - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.48)

दुश्चेष्टानां दुर्मतीनांच कोटिःकोटिर्घोरानर्थदुर्वासनानाम् ।
कामं वृन्दाकानने मेऽस्तु मास्तु श्रीराधाया विस्मृतं नाममात्रम् ॥

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (10.48)

इस श्रीवृन्दावन में मुझसे कोटि-कोटि दुश्चेष्टाएं हो या कुमति उदय हों या घोर अनर्थ तथा दुर्वासनाएं उदित हो, एकमात्र श्रीराधा-नाम मुझे कदापि विस्मृत न हो ।