जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै - श्री हित दामोदर दास

जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै - श्री हित दामोदर दास

(राग मलार)
जो कोऊ वृन्दाविपिन बसै।
जद्दपि पाप-पहार रह्यौ बढ़ि, तामें डोलत सहज नसै ॥ [1]
जिन अहि काल ग्रसे सुरपति से, ताहि न कबहूँ भूलि डसै ।
दम्पति सम्पति धरि हृदै दिन, संतत आनंद माँहिं हँसै ॥ [2]
जिहिं भव-निधि में बूड़त उछरत, सो कबहूँ नहिं सुपन धसै ।
‘दामोदर हित’ गुरु करुणा तें, गावै पावै रास रसै ॥ [3]

- श्री हित दामोदर दास

वृंदावन वास की ऐसी अद्भुत महिमा है कि यदि किसी को वृंदावन वास मिल जाये और उसके पहाड़ के समान भी पाप हों, तो भी सहजता से यहाँ डोलने से नष्ट हो जाते हैं । [1]

जिस काल की चपेट में आकर स्वर्ग सम्राट इंद्र भी अपना पद खो देता है, वह काल भी वृंदावन वासी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता । वृंदावन वास करने से सहज ही दंपति (श्री राधा कृष्ण) रूपी सम्पति ह्रदय को प्राप्त हो जाती है जिससे जीव को सतत आनंद प्राप्त हो जाता है । [2]

भव सागर में डूबता हुआ जीव यदि वृंदावन वास करे तो निश्चित ही उसका कल्याण होगा । श्री हित दामोदर दास जी कहते हैं कि वृंदावन वास करने वाला जीव, गुरु की कृपा से, रास रस का अधिकारी बनकर उसका गान एवं पान करने लगता है । [3]