महल मदन माती अली ये -  श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी

महल मदन माती अली ये - श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी

(राग विहागरो)
महल मदन माती अली ये औरहि कहा मानें ।
अलबेली के संग भई अलबेली पहिरें बसन सहानें ॥ [1]
वेद भेद बिनु नेम प्रेम बिनु नेकुं न मन में आनें ।
अछन-अछन पग धरहिं कुंज मग मगज चढे असमानें ॥ [2]
अति सोहन मन मोहन हूँ सों बात ऐँंठ की ठानें ।
इनकी गति मति प्रीति नीति, वल्लभ रसिकहि जानें ॥ [3]

- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी

श्री राधा के निज महल की सखियाँ, श्री राधा के निज महल के रस में ऐसी उन्मत्त रहती हैं कि उनके (श्री राधा के) अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं मानती । यह सखियाँ तो अलबेली (राधा जू) के नित्य ही संग में रहती हैं एवं उनके आभूषण, वस्त्र आदि की अंग सेवा करती रहती हैं । [1]

इनके रस के मर्म को वेद भी नहीं जानता । यह सखियाँ प्रेम के अतिरक्त अन्य किसी नियम को एक क्षण के लिए भी नहीं मानती । वे तो कुंज महल के रस में ऐसी मगन रहती हैं कि कुंज महल को त्याग कर कभी बाहर नहीं जाती । [2]

अन्य किसी की तो गिनती ही क्या साक्षात मनमोहन श्री कृष्ण से भी यह ऐंठ में रहती हैं । श्री वल्लभ रसिक जी कहते हैं कि कोई विरला ही (अनन्य रसिक) होगा जो इन निज महल की सखियों की गति एवं प्रीति की रीति को जानता होगा । [3]