(राग गौरी)
आनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन में।
श्रीराधा मुख पूरण शशि निरखत उमगि चल्यौ ब्रज वृंदावन में ॥ [1]
इत रोक्यौ यमुना उत गोपिन कछु एक फैल पर्यौ त्रिभुवन में ।
ना परसौ कर्मठ और ज्ञानी अटक रह्यौ रसिकन के मन में ॥ [2]
मंद मंद अवगाहत बुद्धि बल भक्त हेत लीला छिन-छिन में ।
कछु एक लह्यौ नंदसुवन कृपा ते सो देखियत परमानंद जन में ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (551)
श्री राधा के शरद पूर्णिमा के चन्द्र के समान मुख को देखकर, श्री कृष्ण के श्री अंगों में आनंद का सिंधु ऐसा उमड़ने लगा कि वह आनंद का समुद्र लहर बनकर ब्रज वृंदावन में बह चला । [1]
उस आनंद को इधर श्री यमुना जी ने रोक लिया, और उधर गोपियों ने एवं थोड़ा सा त्रिभुवन में फ़ैल गया । उस आनंद का स्पर्श न तो कर्मी प्राप्त कर सका और न ही ज्ञानि । यह राधा के मुख का आनंद ठाकुर जी के ह्रदय से होता हुआ रसिकों के मन में जा अटका । [2]
उस आनंद को रसिक जन बहुत ही मंद मंद अवगाहन करते हैं अर्थात् उस रस में धीरे धीरे डुबकी लगाते हैं जिससे उनको हर क्षण श्री राधा कृष्ण की लीलाओं के दर्शन होते हैं । श्री परमानंद दास जी कहते हैं कि ऐसे आनंद के समुद्र में से थोड़ा सा आनंद मुझे भी नंदलाल (श्री कृष्ण) की कृपा से प्राप्त हुआ है और उसी आनंद के दर्शन निज जनों में भी होते हैं । [3]
आनंद सिंधु बढ्यौ हरि तन में।
श्रीराधा मुख पूरण शशि निरखत उमगि चल्यौ ब्रज वृंदावन में ॥ [1]
इत रोक्यौ यमुना उत गोपिन कछु एक फैल पर्यौ त्रिभुवन में ।
ना परसौ कर्मठ और ज्ञानी अटक रह्यौ रसिकन के मन में ॥ [2]
मंद मंद अवगाहत बुद्धि बल भक्त हेत लीला छिन-छिन में ।
कछु एक लह्यौ नंदसुवन कृपा ते सो देखियत परमानंद जन में ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (551)
श्री राधा के शरद पूर्णिमा के चन्द्र के समान मुख को देखकर, श्री कृष्ण के श्री अंगों में आनंद का सिंधु ऐसा उमड़ने लगा कि वह आनंद का समुद्र लहर बनकर ब्रज वृंदावन में बह चला । [1]
उस आनंद को इधर श्री यमुना जी ने रोक लिया, और उधर गोपियों ने एवं थोड़ा सा त्रिभुवन में फ़ैल गया । उस आनंद का स्पर्श न तो कर्मी प्राप्त कर सका और न ही ज्ञानि । यह राधा के मुख का आनंद ठाकुर जी के ह्रदय से होता हुआ रसिकों के मन में जा अटका । [2]
उस आनंद को रसिक जन बहुत ही मंद मंद अवगाहन करते हैं अर्थात् उस रस में धीरे धीरे डुबकी लगाते हैं जिससे उनको हर क्षण श्री राधा कृष्ण की लीलाओं के दर्शन होते हैं । श्री परमानंद दास जी कहते हैं कि ऐसे आनंद के समुद्र में से थोड़ा सा आनंद मुझे भी नंदलाल (श्री कृष्ण) की कृपा से प्राप्त हुआ है और उसी आनंद के दर्शन निज जनों में भी होते हैं । [3]

