गौर श्याम रस सिन्धु में केलि तरंग अपार  - श्री लाड़लीदास, सुधर्म बोधिनी (4.37)

गौर श्याम रस सिन्धु में केलि तरंग अपार - श्री लाड़लीदास, सुधर्म बोधिनी (4.37)

गौर श्याम रस सिन्धु में, केलि तरंग अपार ।
गाई गावत गाय हैं, रसिकू सुयश विस्तार ॥

- श्री लाड़लीदास, सुधर्म बोधिनी (4.37)

गौर और श्याम (श्यामा-श्याम) रस के अगाध सिंधु हैं, जिसमें नित्य-विहार की अनंत केली तरंगें हिलोरें लेती हैं। रसिक जन युगों से इनके इसी पावन यश का गायन करते आए हैं, कर रहे हैं और अनंत काल तक करते रहेंगे।