इनको सहज सुहाग सुख, वर्णनत बनत न बैंन ।
रूपरसिक जो जांनहीं, सो देखत भरि नैंन ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, रस मंजरी (7)
श्री प्रिया-प्रियतम का सहज दाम्पत्य-रस वाणी से वर्णित नहीं किया जा सकता। यदि इसका परिचय प्राप्त करना है, तो निष्काम रसमय भजन के नेत्रों से इसे निहारना होगा।
रूपरसिक जो जांनहीं, सो देखत भरि नैंन ॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, रस मंजरी (7)
श्री प्रिया-प्रियतम का सहज दाम्पत्य-रस वाणी से वर्णित नहीं किया जा सकता। यदि इसका परिचय प्राप्त करना है, तो निष्काम रसमय भजन के नेत्रों से इसे निहारना होगा।

