(राग विहागरौ)
मेरे संत चरण रज अंजन।
तीन ताप अरु तिमिर नसावै, काम क्रोध दल गंजन ॥ [1]
सदा अमित आनंद बढावै, भाल तिलक उर मंजन ।
जुगल-केलि बन की दरसावै, रूपसखी मन रंजन ॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (99)
रसिक संतों के चरणों की रज ही मेरे लिए ह्रदय की आँखों को प्रकाश देने वाला अंजन है जिससे तीनों ताप एवं समस्त अंधकार का नाश हो जाता है और काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मात्सर्य जैसे शत्रुओं के दल के दल विदलित हो जाते हैं । [1]
रसिक संतों की चरण रज ही मेरे मस्तक की शोभा है, ह्रदय को निर्मल बनाने वाली तथा असीम आनंद की अभिवर्धक है । श्री रूप सखी जी कहते हैं कि केवल इतना ही नहीं, वृंदावन के निभृत निकुंजों की श्यामा श्याम की गुप्त केली, जो सखियों के मन को भाने वाली है, वे इन रसिक संतों की रज के प्रताप से प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगती है । [2]
मेरे संत चरण रज अंजन।
तीन ताप अरु तिमिर नसावै, काम क्रोध दल गंजन ॥ [1]
सदा अमित आनंद बढावै, भाल तिलक उर मंजन ।
जुगल-केलि बन की दरसावै, रूपसखी मन रंजन ॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (99)
रसिक संतों के चरणों की रज ही मेरे लिए ह्रदय की आँखों को प्रकाश देने वाला अंजन है जिससे तीनों ताप एवं समस्त अंधकार का नाश हो जाता है और काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मात्सर्य जैसे शत्रुओं के दल के दल विदलित हो जाते हैं । [1]
रसिक संतों की चरण रज ही मेरे मस्तक की शोभा है, ह्रदय को निर्मल बनाने वाली तथा असीम आनंद की अभिवर्धक है । श्री रूप सखी जी कहते हैं कि केवल इतना ही नहीं, वृंदावन के निभृत निकुंजों की श्यामा श्याम की गुप्त केली, जो सखियों के मन को भाने वाली है, वे इन रसिक संतों की रज के प्रताप से प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने लगती है । [2]

