बरसाने महल लाड़िली के ।
ओर पास वाके बाग-बगीचा, बिच-बिच पेड़ माधुरी के ॥ [1]
तिनमहलन विहरत प्रिया-प्रीतम, निसिदिन प्रिया चाड़िली के ।
‘वृन्दावन हित’ रंग बरसत है, छिन-छिन रस जु बाढ़िली के ॥ [2]
- चाचा वृन्दावन दास जी
श्री लाड़ली जू के महल बरसाने की शोभा ही निराली है जिसके पास बाग और बगीचे हैं जो मधुर मधुर वृक्षों से आच्छादित हैं । [1]
उस महल में नटखट स्वामिनी जू के हित के हेतु प्रियतम (प्रिया के संग) नित्य ही विहरण करते हैं । श्री हित वृंदावन दास जी कहते हैं कि बरसाने में अद्भुत रंग (प्रेम रस) बरसता है एवं उस रस को स्वयं श्री लाडली जी क्षण क्षण बढ़ाती हैं । [2]
ओर पास वाके बाग-बगीचा, बिच-बिच पेड़ माधुरी के ॥ [1]
तिनमहलन विहरत प्रिया-प्रीतम, निसिदिन प्रिया चाड़िली के ।
‘वृन्दावन हित’ रंग बरसत है, छिन-छिन रस जु बाढ़िली के ॥ [2]
- चाचा वृन्दावन दास जी
श्री लाड़ली जू के महल बरसाने की शोभा ही निराली है जिसके पास बाग और बगीचे हैं जो मधुर मधुर वृक्षों से आच्छादित हैं । [1]
उस महल में नटखट स्वामिनी जू के हित के हेतु प्रियतम (प्रिया के संग) नित्य ही विहरण करते हैं । श्री हित वृंदावन दास जी कहते हैं कि बरसाने में अद्भुत रंग (प्रेम रस) बरसता है एवं उस रस को स्वयं श्री लाडली जी क्षण क्षण बढ़ाती हैं । [2]

