श्रीवन निकुंजन में प्रीतम के संग प्यारी - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, महल वर्णन (4)

श्रीवन निकुंजन में प्रीतम के संग प्यारी - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, महल वर्णन (4)

(कवित्त)
श्रीवन निकुंजन में प्रीतम के संग प्यारी,
चाह भरी दीन जान दरस दिखाओगी । [1]
माल जुही लाऊँ पहिराऊँ हरिषाऊँ तवै,
निज कर पल्‍लव को शीश पे धराओंगी ॥ [2]
नीर भर लावों री पिवावो हमें आय धाय,
‘लाल बलवीर' दासी टेर यो बुलावोगी । [3]
और कौन मेरो तेरो चेरी हूँ मैं गोरी भोरी,
हा-हा श्री किशोरी मोहि कब अपनाओगी ॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, महल वर्णन (4)

हे प्यारी जू [श्री राधा]! कब आप मुझ दीन पर कृपा करके श्री वृंदावन के निकुंजों में, प्रियतम के संग अपना दर्शन दिखलाओगी । [1]

कब मैं सुंदर फूलों की माला को गूँथकर, तुम्हें पहनाकर अत्यंत हर्षित हो उठूँगी, और तुम अपने कमल के समान हस्त को मेरे शीश पर धराओगी ? [2]

श्री लाल बलबीर कहते हैं कि ऐसा कब होगा जब अपनी इस दासी को भी आप आवाज़ देकर बुलाओगी और कहोगी कि मुझे पानी भरकर पिला दो । [3]

हे मेरी गोरी एवं भोरी राधे! मैं सत्य कहती हूँ कि मैं तो तुम्हारी ही अनन्य दासी हूँ, तुम्हारे अतिरिक्त मेरा कोई नहीं है । तुम भी अपना निज जान मुझे कब अपनाओगी? [4]