श्रीराधे वृषभानुजा तुम तौ दीन-दयाल - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (18)

श्रीराधे वृषभानुजा तुम तौ दीन-दयाल - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (18)

श्रीराधे वृषभानुजा तुम तौ दीन-दयाल ।
केहि हित निठुराई धरी, देखि दीन को हाल ॥

- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली, भक्त सर्वस्व (18)

हे वृषभानु-नन्दिनी श्रीराधे! आप तो स्वभाव से ही करुणावत्सला और दीन-दयालु हैं; फिर किस कारण आपने मेरे प्रति ऐसी निष्ठुरता धारण कर ली है? अपनी इस दीन-दासी की दशा की ओर कृपा-दृष्टि तो डालिए।