मन रे चल वृन्दावन रहिये ।
कोटि जनम के पाप मिटत है,
ब्रज रज शीष चढ़इये ॥ [1]
रज में बैठ वृजरज की लीला,
दर्शन कर सुख पइये ।
श्याम प्रिया की मधुर छबि पे,
तन मन धन न्यौछावर करिये ॥ [2]
- श्री श्यामदास
अरे मन, तू वृंदावन में ही नित्य वास कर । वृन्दावन की रज को शीष पर चढ़ाने से कोटि जन्मों के पाप मिट जाते हैं । [1]
इस रज में बैठ कर श्री श्यामा श्याम की मधुर लीलाओं का दर्शन कर सुखी रहो । श्री श्याम दास कहते हैं कि श्री कृष्ण की प्रिया अर्थात् श्री राधा की छवि पर अपना तन, मन और धन न्यौछावर कर दो। [2]
कोटि जनम के पाप मिटत है,
ब्रज रज शीष चढ़इये ॥ [1]
रज में बैठ वृजरज की लीला,
दर्शन कर सुख पइये ।
श्याम प्रिया की मधुर छबि पे,
तन मन धन न्यौछावर करिये ॥ [2]
- श्री श्यामदास
अरे मन, तू वृंदावन में ही नित्य वास कर । वृन्दावन की रज को शीष पर चढ़ाने से कोटि जन्मों के पाप मिट जाते हैं । [1]
इस रज में बैठ कर श्री श्यामा श्याम की मधुर लीलाओं का दर्शन कर सुखी रहो । श्री श्याम दास कहते हैं कि श्री कृष्ण की प्रिया अर्थात् श्री राधा की छवि पर अपना तन, मन और धन न्यौछावर कर दो। [2]

