(सवैया)
वा मुसकान पै प्रान दियौ, जिय जान दियौ वहि तान पै प्यारी। [1]
मान दियौ मन मानिक के संग, ता मुख मंजु पै जोबन वारी॥ [2]
वा तन कौ रसखान पै वारी, तन ताहि दियौ नहीं ध्यान विचारी। [3]
सौं मुँह मोरि करी अब का हुएँ, लाल लै आज समाज में ख्वारी॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
एक गोपी अपनी सखी से कहती है, “हे सखि! श्यामसुंदर की एक मुस्कान पर मैंने अपना प्राण वार दिया और उसकी बंसी की मीठी धुन पर अपना मन अर्पित कर दिया। [1]
रत्न समान अपने मन और आबरू को भी उसे दे दिया, और उसके मुख-सौंदर्य पर मुग्ध होकर अपना यौवन तक भी उसे न्यौछावर कर दिया। [2]
अपने तन को भी उस रस की खान श्यामसुंदर को दे दिया। इतना सब कुछ करते हुए, मैंने अपने मान, सम्मान और कुल की लाज-मर्यादा के बारे में भी नहीं सोचा। [3]
हे सखि! मेरा सर्वस्व लेकर अब श्यामसुंदर पता नहीं क्यों मुझसे मुख मोड़कर चले गए। मैं उस कृष्ण को अब क्या कहूं, उसके चलते ही तो समाज में मेरी इतनी बदनामी हुई है। [4]
वा मुसकान पै प्रान दियौ, जिय जान दियौ वहि तान पै प्यारी। [1]
मान दियौ मन मानिक के संग, ता मुख मंजु पै जोबन वारी॥ [2]
वा तन कौ रसखान पै वारी, तन ताहि दियौ नहीं ध्यान विचारी। [3]
सौं मुँह मोरि करी अब का हुएँ, लाल लै आज समाज में ख्वारी॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
एक गोपी अपनी सखी से कहती है, “हे सखि! श्यामसुंदर की एक मुस्कान पर मैंने अपना प्राण वार दिया और उसकी बंसी की मीठी धुन पर अपना मन अर्पित कर दिया। [1]
रत्न समान अपने मन और आबरू को भी उसे दे दिया, और उसके मुख-सौंदर्य पर मुग्ध होकर अपना यौवन तक भी उसे न्यौछावर कर दिया। [2]
अपने तन को भी उस रस की खान श्यामसुंदर को दे दिया। इतना सब कुछ करते हुए, मैंने अपने मान, सम्मान और कुल की लाज-मर्यादा के बारे में भी नहीं सोचा। [3]
हे सखि! मेरा सर्वस्व लेकर अब श्यामसुंदर पता नहीं क्यों मुझसे मुख मोड़कर चले गए। मैं उस कृष्ण को अब क्या कहूं, उसके चलते ही तो समाज में मेरी इतनी बदनामी हुई है। [4]

