सो पापनि कौ मूल है, एकहि पैसा रोक ।
हरिजन बाँध्यौँ गाँठि सों, तौ छूटे हरि सों थोक ॥
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (22)
समस्त अनर्थों और पापों का मूल कारण धन का मोह (संग्रह-वृत्ति) ही है। जो जीव लोभ वश धन की गाँठ बाँधता रहता है, उसका श्रीहरि से आत्यंतिक संबंध स्वतः ही विच्छिन्न हो जाता है।
हरिजन बाँध्यौँ गाँठि सों, तौ छूटे हरि सों थोक ॥
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (22)
समस्त अनर्थों और पापों का मूल कारण धन का मोह (संग्रह-वृत्ति) ही है। जो जीव लोभ वश धन की गाँठ बाँधता रहता है, उसका श्रीहरि से आत्यंतिक संबंध स्वतः ही विच्छिन्न हो जाता है।

