(राग ज़िला)
श्री वृंदावन ध्याना हेली, श्री वृंदावन ध्याना है ।
गौरश्याम चरणारवृन्द सों, अब अनुराग बढ़ाना है ॥ [1]
रहौ प्राण कि जाओ सखी री, नेम यही दृढ़ ठाना है ।
“ललितलड़ैती" उठत बैठत युगल नाम-गुण गाना है ॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (35)
हे सखी, अब तो श्री वृंदावन का ही अनन्य चिंतन करना है क्योंकि अब मुझे दिव्य युगल गौर श्यामल वर्ण के प्रिया प्रियतम के चरणों में ही अनन्य रूप से प्रेम बढ़ाना है । [1]
अब तो चाहे मेरे प्राण रहें या ना रहें, मेरे जीवन का यही एक मात्र दृढ़ व्रत है । श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं कि अब तो उठते बैठते युगल नाम एवं गुणों का ही गान करना है । [2]
श्री वृंदावन ध्याना हेली, श्री वृंदावन ध्याना है ।
गौरश्याम चरणारवृन्द सों, अब अनुराग बढ़ाना है ॥ [1]
रहौ प्राण कि जाओ सखी री, नेम यही दृढ़ ठाना है ।
“ललितलड़ैती" उठत बैठत युगल नाम-गुण गाना है ॥ [2]
- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (35)
हे सखी, अब तो श्री वृंदावन का ही अनन्य चिंतन करना है क्योंकि अब मुझे दिव्य युगल गौर श्यामल वर्ण के प्रिया प्रियतम के चरणों में ही अनन्य रूप से प्रेम बढ़ाना है । [1]
अब तो चाहे मेरे प्राण रहें या ना रहें, मेरे जीवन का यही एक मात्र दृढ़ व्रत है । श्री ललित लड़ैती जी कहते हैं कि अब तो उठते बैठते युगल नाम एवं गुणों का ही गान करना है । [2]

