भ्रमत रहत निसिदिन छिना - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (93)

भ्रमत रहत निसिदिन छिना - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (93)

भ्रमत रहत निसिदिन छिना, छके अधिक रस नेह ।
प्यारी तुव पद कंज पर, मो दृग मधुकर एह ॥

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सहज सुख (93)

श्री कृष्ण कहते हैं कि हे राधे! मेरे नेत्र-रूपी भौंरे तुम्हारे कमल-रूपी चरणों के प्रेम-रस में ऐसे सराबोर रहते हैं कि ये भौंरे उन चरण-कमलों पर रात-दिन मंडराते रहते हैं।