(राग झंझोटी, त्रिताल)
राधे कौन भयो अपराध हमारो ।
श्री वृन्दावन वास छुड़ायो, जो है प्राणन प्यारो ॥ [1]
वेगि बुलाओ मोहि स्वामिनी, अवगुन उर न धारो ।
प्राणन-प्यारी हित गोपाल की, अब तो तोहे पुकारो ॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (49)
हे श्री राधे! ऐसा कौन सा मुझसे अपराध बन गया कि मेरा वृंदावन वास छूट गया जो मेरे प्राणों से भी अधिक प्यारा है । [1]
हे स्वामिनी! मेरे अवगुणों को अनदेखा कर मुझे वृंदावन में शीघ्र ही बुला लो । श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि हे मेरी प्राण प्यारी, अब तो मैंने केवल तुमको ही पुकारा है । [2]
राधे कौन भयो अपराध हमारो ।
श्री वृन्दावन वास छुड़ायो, जो है प्राणन प्यारो ॥ [1]
वेगि बुलाओ मोहि स्वामिनी, अवगुन उर न धारो ।
प्राणन-प्यारी हित गोपाल की, अब तो तोहे पुकारो ॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (49)
हे श्री राधे! ऐसा कौन सा मुझसे अपराध बन गया कि मेरा वृंदावन वास छूट गया जो मेरे प्राणों से भी अधिक प्यारा है । [1]
हे स्वामिनी! मेरे अवगुणों को अनदेखा कर मुझे वृंदावन में शीघ्र ही बुला लो । श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि हे मेरी प्राण प्यारी, अब तो मैंने केवल तुमको ही पुकारा है । [2]

![राधे कौन भयो अपराध हमारो - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (49)](https://images.brajrasik.org/653d4380f863bd000871528b-m.jpeg)